September 23, 2010

चिराग़े-मुर्दः हूँ मैं बेज़बाँ गोरे गरीबाँ का : मिर्ज़ा ग़ालिब

सताइशगर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़े-रिज्वॉ का,
वह इक गुलदस्तः है हम बेख़ुदों के ताक़े-निसियाँ का ।


मतलब जिस ज़ाहिद (परहेज़गार, संयमी) जिस स्वर्गोद्यान की इतनी प्रशंसा करता है और हमें प्रलोभन देकर उधर आकर्षित करना चाहता है, हमारे-जैसे बेख़ुद लोग उसकी परवाह भी नहीं करते, उसे रखकर भूल जाते हैं ।
इसमें ताक़े-निसियाँ का अर्थ वह ताक जिस पर कुछ रखकर भूल जाएँ । प्रायः गुलदस्ता ताक़ में ही सजाया जाता है ।

ख़ामोशी में निहाँ खूँगश्तः लाखों आरजुएँ हैं,
चिराग़े-मुर्दः हूँ मैं बेज़बाँ गोरे गरीबाँ का ।


"जिस प्रकार परदेसियों और पथिकों की क़ब्रों के बुझे हुए दीपक उनकी लाखों कामनाओं को अपने कलेजे में छिपाए होते हैं वैसे ही मेरे मौन में भी रक्तरंजित लाखों कामनाएँ निहित है ।" यहाँ चिराग़े-मुर्दः का मतलब बुझा हुआ या मौन दीपक से है ।

7 comments:

AVADH said...

बहुत खूब! शुक्रिया बहुत बहुत इतने उम्दा शैर से तार्रुफ करवाने के लिए.
अवध लाल

Vandana ! ! ! said...

उफ्फ्.... पढकर मज़ा आ गया.खास कर अर्थ को अछ्छी तरह समझ कर. मैंने मिर्ज़ा ग़ालिब को कभी पढ़ा नहीं सिर्फ इसलिए की उर्दू इतनी अच्छी आती नहीं. मगर आपके एक ब्लॉग में ये कमी भी पूरी हो जायेगी.

सुशीला पुरी said...

गालिब मेरे प्रिय शायर ......... आपका आभार !

सुशीला पुरी said...

आपका तरीका लाजवाब है ...पोस्ट लिखने का ... हार्दिक बधाई ।

Manasa said...

nice blog. :)

Thanks for visiting my blog.

सारा सच said...

अच्छे है आपके विचार, ओरो के ब्लॉग को follow करके या कमेन्ट देकर उनका होसला बढाए ....

नीरज said...

बहुत खूब मियां ............. बहुत दिनों बाद किसी ब्लॉग पर ठहर कर कुछ पढने का मन किया

कुछ दिल से